हिंदी कविता का अथेंटिक ठिकाना

रविवार, 3 जून 2012

(मेरी नई कविता)

 ‘एसी’ की धूप बहुत सख्त है।
चुभती है !

कोरा सुकून,
भूल भुलैया में ज़िंदगी के मई-जून।
कर देती है रीढ़विहीन,
पसीने-पसीने अफलातून।
मन की तबीयत पर झपट्टा,
बाज सी निपोरी खीस अभिशप्त है।

‘एसी’ की धूप बहुत सख्त है।
चुभती है !

मां के गर्भ में उष्मा थी।
9 महीने...
नई-नई प्रक्रियाओं ने हमें जन्मा था।
किस कालांतर में...
हम भयाक्रांत सिहरन से जड़वत हो गए ?
जकड़ लिया ‘एसी’ ने।
ओढ़ ली,
सर से पांव तक...
दमघोंटू ‘ब्लैंकेट’ ।
मृतपाय नींद कैसी तृप्त है !

‘एसी’ की धूप बहुत सख्त है।
चुभती है !

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